ख्वाहिशों की कुछ ना कहो… | प्रतिभा कटियारी

ख्वाहिशों की कुछ ना कहो… | प्रतिभा कटियारी

तेरे होने पर सूरज गुलाम था मेरा
रास्ते मेरा कहा मानते थे
चाँद बिछा रहता था राहों में
और मैं दुबक जाती थी बहारों के आँचल में
कभी धूप में भीग जाती थी
कभी बूँदें सुखा भी देती थीं
बसंत मोहताज नहीं था कैलेंडर का
जेठ की तपती दोपहरों में भी
धूल के बगूले उड़ाते हुए
घनघोर तपिश के बीच
वो आ धमकता था
कभी सर्दियों में आग तापने बैठ जाता था
मेरे एकदम करीब सटकर
पेड़ों पर कभी भी खिल उठते थे पलाश
और खेतों में कभी भी लहरा उठती थी सरसों
तुम थे तो ठहर ही जाते थे पल
और भागता फिरता था मन
मुस्कुरा उठता था धरती का जर्रा-जर्रा
और खिल उठती थीं कलियाँ
बिना बोए गए बीजों में ही कहीं
मौसम किसी पाजेब से बंध जाते थे पैरों में
और पैर थिरकते फिरते थे जहाँ-तहाँ
कैसी दीवानगी थी फिर भी
लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे
और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता, सच
बच्चे मुँह लटकाए जाते हैं स्कूल
लौट आते हैं वैसे ही
शाम को गायें लौटती हैं जरूर वापस
लेकिन नहीं बजती कहीं बाँसुरी
शाम उदासी लिए आती है
और समंदर की सत्ताईसवीं लहर में
छुप जाती है कहीं
मृत्यु नहीं आती आह्वान करने पर भी
और जीवन दूर कहीं जा खड़ा हुआ है
मंदिरों से गायब हो गए हैं भगवान
खाली पड़े हैं चर्च
सजदे में झुके सर
अचानक इतने भारी हो गए कि उठते ही नहीं
न जाने कौन सी नदी आँखों में उतर आई है
जिसे कोई समंदर नसीब होता ही नहीं
तुम्हारे जिस्म की खुशबू नहीं है कहीं
फिर हवा क्या उड़ाए फिरती है भला
क्या मालूम
लौट आओगे एक रोज तुम
जैसे लौटे थे बुद्ध
जैसे लौट आए थे लछमन
जैसे रख दिए थे सम्राट अशोक ने हथियार
वैसे ही तुम भी रख दोगे अपने विरह को दूर कहीं
लेकिन उन पलों का क्या होगा
जो निगल रहे हैं हर साँस को
कैसे बदलेगा यशोधरा और उर्मिला का अतीत
कैसे नर्मदा अपने होने पर अभिमान करेगी
तुम्हारा आना कैसे दे पाएगा उन पलों का हिसाब
जिन्हें ना जीवन में जगह मिली
न मृत्यु में
सूरज अब भी कहा मानने को बेताब है
लेकिन क्या करूँ कि कुछ कहने का
जी नहीं करता
मौसम अब भी तकते हैं टुकुर-टुकुर
लेकिन उनकी खिलखिलाहटों से
अब नहीं सजता जीवन
एक झलक देख लूँ तो जी जाऊँ
पलक में झाँप लूँ सारे ख्वाब
रोक लूँ जीवन का पहिया और लौटा लाऊँ
वो सोने से दिन और चाँदी सी रातें
हाँ, मैं कर सकती हूँ ये भी
लेकिन विसाल-ए-आरजू तुम्हें भी तो हो
तुम्हारे सीने में भी तो हो एक बेचैन दिल
जीवन किसी सजायाफ्ता मुजरिम सा लगे
और बेकल हों तुम्हारी भी बाँहे
इक उदास जंगल को अपनी आगोश में लेने को
मेरी ख्वाहिशों की अब कुछ ना कहो
कि अब ख्वाब उतरते ही नहीं नींद के गाँव
पाश की कविता का पन्ना खुला रहता है हरदम
फिर भी नहीं बचा पाती हूँ सपनों का मर जाना
क्या तुम्हारी जेब में कोई उम्मीद बाकी है
क्या तुम्हें यकीन है कि
जिंदगी से बढ़कर कुछ भी नहीं
और ये भी कि जिंदगी बस तुम्हारे होने से है
क्या सचमुच तुम्हें इस धरती की कोई फिक्र नहीं
नहीं फिक्र मौसमों की आवारगी की
नहीं समझते कि क्यों हो रही हैं
बेमौसम बरसातें
और क्यों पूर्णमासियाँ होने लगी है
अमावस से भी काली
कि ढाई-अक्षर कितने खाली-खाली से हो गए है
लाल गुलाबों में खुशबू नहीं बची
नदियों में कोई आकुलता नहीं
पहाड़ ऊँघते से रहते हैं
समंदर चुप की चादर में सिमटा भर है
कोई अब रास्तों को नहीं रौंदता
कोई नहीं बैठता नदियों के किनारे
कहीं से नहीं उठता धुआँ और
नहीं आती रोटी के पकने की खुशबू
तुम कौन हो आखिर कि जिसके जाने से
इस कायनात ने साँस लेना बंद कर दिया
क्या तुम खुदा हो या प्रेमी कोई…

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Pratibha Katiyar Stories / Poems

हरा | प्रतिभा कटियारी

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हत्यारे की आँख का आँसू और तुम्हारा चुंबन सुनो | प्रतिभा कटियारी

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