अवधी कविताएँ | नीरज पांडेय

अवधी कविताएँ | नीरज पांडेय

१. इहइ तोहार है चौकीदारी

हे मानव
बेलबाटम धारी
छत्तीस रोग की एक महतारी
कुल कुरिया के सरपत लइके
भाग गवा पाथर व्यापारी
ना कुछ देख्या ना कुछ पूछ्या
इहइ तोहार है चौकीदारी
केसे कहब्या कहाँ लिखउब्या
अब के वोकर रोंवा उचारी

२. बतावा का लेब्या

संगत पाए लोहा पउंड़इ
हवा पाए कतवार
जउन मिलय सब लइके भागा
राजा भए भतार
बतावा का लेब्या

३. रोपनी

धनवा के कीला ज खोंसिन
अँचरा अँगोटिन
बदरा मनाइन हो

बदरा सुरजू के जाइ ढाँकि लेत्या
बरसि झूमि जात्या
तू धरती जुड़वउत्या हो…

धाइ-धाइ अढ़वइं बदरवा
पसीझइ करेजवा
न गरजइ न बरसइ हो

बदरा रोपनी बा तोहरे भरोसे
जिनगिया बा तोसे
तुहीं से जिया हरसइ हो

कीला ज रहि-रहि झुराइं
त जियरा डेराइ
बिनु पानी सब तरसइं हो

रामा गिहिथिन मेड़वा अगोरइं
दुअरवा बटोरइं
पियासिनि कसकइं हो।

४. फगुआ

बिदा करा घर जाई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई…

कउने रंग से ढाँकी खुद का
कउने रंग से ढाँकी खुद का
कउने रंगे ओढ़ाई
हो कउने रंगे ओढ़ाई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई…

सब रंगन की हड़तालन माँ
हड़तालन माँ, हड़तालन माँ
रंग गवा मेहराई
मोरा रंग गवा मेहराई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई…

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कंडी उपरी ओद परी बा
लकड़ी डिंगरी घुन से भरी बा
घुन से भरी बा, घुन से भरी बा
सरपत-नरकट बोदा होइगा
कैसे होली जराई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई…

जेकरे खातिर पेट जरत है
पेट जरत है जिउ कलपत है
बीच डगरिया छोड़ि के भागा
ऊ होइगा हरजाई
हो ऊ होइगा हरजाई भोइइतिन
बिदा करा घर जाई…

अस फगुआ हम कबहुँ न खेले
कबहुँ न खेले, कबहुँ न खेले
साँसत माँ सब खेल-खेलाड़ी
कि देखतइ छूटइ रोवाई
हो देखतइ छूटइ रोवाई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई…

बिदा करा घर जाई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई..

५. बीती कउने सुरतिया इ फागुन

बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
बीती कउने सुरतिया 
सइयाँ भयेन परदेसिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया

ओठे के लाली चढ़तइ नाहीं 
हाथे के चूड़ी बोलत नाहीं 
माथे न सोहे टिकुलिया 
हो माथे न सोहे टिकुलिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया 
बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
सइयाँ भयेन परदेसिया

बँधइ न जूरा न चढ़इ महावर 
पाएल गोड़े में काटइ दउड़इ 
ना कमर रुकइ करधनिया 
हो ना कमर रुकइ करधनिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया 
बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
सइयाँ भयेन परदेसिया

लड़िकन बाबू बाबू रेघँइ 
रेघत रेघत खुब सुधिआवंइ 
छूँछ लेहे पिचकरिया 
हो छूँछ लेहे पिचकरिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया 
बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
सइयाँ भयेन परदेसिया

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दिन दुपहर सब लागैं दुसमन 
रतिया बीछी के आँणा टुपकै 
जिया में जगाई दरदिया 
हो जिया में जगाई दरदिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया 
बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
सइयाँ भयेन परदेसिया

गोड़े हाथे में जिउ ना रहि गा 
अब तउ आई के तू सुधि लइ ल्या 
अंखिया होइ गइ गड़हिया 
हो अँखिया हो गइ गड़हिया 
सखी हो बीती कउने सुरतिया 
बीती कउने सुरतिया इ फागुन 
सइयाँ भयेन परदेसिया

६. इहइ तउ फागुन आ

दुइनउ हाथ रंग में अरझा 
मूड़ से गिर गई साड़ी 
बूढ़ पुरनिया आवत होइहैं 
कइसे घूँघुट काढ़ी 
सइयाँ जल्दी अउत्या 
तनी कुछ मदद करउत्या 
एतना जिन सरमा 
इहइ तउ फागुन आ

७. छूँछ लेहे पिचकारी

कउने ओढ़रे बचबू ओसी 
कहाँ लुकवउबू पइसा 
कोने अंतरे से हेर निकारी 
ऊ आ आँधर भइंसा

रंग गुलाल से दूर रहइ ऊ 
छूँछ लेहे पिचकारी 
जहाँ सुनी ऊ प्रेम के फगुआ 
झोला से निकारी आरी 
काटत काटत हूलत हूलत सरबस लेई छोर 
बिन चटनी के छूँछ पकौड़ा बाँटी चारउ ओर

८. भइंसे की अंधेर

आँधर 
भइंसे की अंधेर 
चरइ खेत उ देर सबेर 
पूरे खेत को खोंढ़र कइके 
भइंसा भाग गवा परदेश 
का पीसी अउ का कूटी हम 
फेकरत बाटइ पूरा देश

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९. ताल भर कउवा

सउ मन धान 
ताल भर कउवा 
बाँटे पउतेन पउवा पउवा 
इहै सोच सरबस लई भागा 
जाई के बसा परदेश ससुरवा 
हल्ला मारेन जब उजबक सब 
त राजा देहेन लुहकार कुकुरवा

१०. बतावा का करी हम

खेला लीला करबइ एतना 
देश में आई पइसा 
जोर लगाके हम बोलब 
तउ तू चिल्लाया हइंसा

खुशी भयेन सब 
नाचेन गाएन 
खुब चिल्लायेन हइंसा 
दिल टूटा 
फिर मुठिया टूटी 
सपना टूट के बुकुनी होई गा 
जब कहेन खजांची काका 
कि देखा जात अहइ वह पइसा 
बतावा का करी हम

११. राजा गा अंधराई

मीठ मीठ तउ खुब बोली उ 
करइ के दाँउ लुकाई 
आपन आपन थाम्हें बइठा 
राजा गा अंधराई

बेंचा बाँची खुब जानइ ऊ 
देश बेंच के सोवइ 
जब जाब्या तू कहइ बरे कुछ 
तब लागी ऊ रोवइ

एतना रोई एतना रोई 
कि जनता जाई पसीझ 
तब ऊ खेली तुरुप के पत्ता 
खूब बनाई चानी 
जनता बेचारी पागल बाटइ 
पकड़ न पाई बेइमानी

राजा नाची अब 
सबके बाँटी अब 
अगर तू ना चेतब्या 
तउ सबके काटी अब